Sunday, July 19, 2026

Skyroot Aerospace: भारत की अंतरिक्ष क्रांति का नया चेहरा







सितारों को छूने वाला स्टार्टअप: कैसे 'SKYROOT' बदल रहा है भारत की अंतरिक्ष कहानी

एक ज़माना था जब अंतरिक्ष की खोज (Space Exploration) सिर्फ बड़े और अमीर देशों की सरकारों का खेल माना जाता था। अगर आपको रॉकेट बनाना होता था, तो आपको अरबों डॉलर और किसी देश की सरकार का पूरा साथ चाहिए होता था। भारत में इसका मतलब था कि हमारे अंतरिक्ष के सपनों का पूरा बोझ अकेले इसरो (ISRO) के कंधों पर था।

लेकिन अब हवा का रुख बदल रहा है। हैदराबाद के एक कोने में एक शांत क्रांति आकार ले रही है, और इस क्रांति की कमान संभाली है एक भारतीय स्टार्टअप ने, जिसका नाम है—स्काईरूट एयरोस्पेस (Skyroot Aerospace)।

इसकी शुरुआत पवन कुमार चंदना और नागा भरत डाका ने की थी। ये दोनों कोई आम उद्यमी (Entrepreneurs) नहीं हैं, बल्कि इसरो के पूर्व वैज्ञानिक हैं। इन्होंने भारत के प्राइवेट स्पेस सेक्टर में कुछ बड़ा करने के लिए अपनी सुरक्षित सरकारी नौकरी छोड़ दी। आज स्काईरूट भारत के प्राइवेट स्पेस रेवोल्यूशन का सबसे बड़ा चेहरा बन चुका है।

आइए जानते हैं कि कैसे कागज़ पर शुरू हुआ एक आइडिया आज आसमान में रॉकेट दाग रहा है।

ऐतिहासिक "प्रारंभ"  मिशन

स्काईरूट की अहमियत को समझने के लिए हमें 18 नवंबर 2022 के उस ऐतिहासिक दिन को देखना होगा। उस दिन श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से 6 मीटर ऊंचे एक चमचमाते रॉकेट 'विक्रम-एस' (Vikram-S) ने आसमान को चीरते हुए उड़ान भरी।

यह कोई बहुत बड़ा रॉकेट नहीं था जो चांद पर जा रहा हो, लेकिन यह ऐतिहासिक था। यह पहली बार था जब किसी भारतीय प्राइवेट कंपनी द्वारा बनाए गए रॉकेट ने अंतरिक्ष में कदम रखा था। इस मिशन को नाम दिया गया था—प्रारंभ। इस स्टार्टअप ने दुनिया को और उन निवेशकों को, जो उन पर शक कर रहे थे, यह साबित कर दिया कि भारतीय युवाओं के पास ऐसा रॉकेट बनाने की काबिलियत है जो सच में उड़ सकता है।

इस रॉकेट का नाम 'विक्रम', भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक डॉ. विक्रम साराभाई के सम्मान में रखा गया था।

छोटे रॉकेट, बड़ा बिजनेस: आखिर रणनीति क्या है?

आप सोच रहे होंगे कि जब एलन मस्क की स्पेसएक्स (SpaceX) जैसे बड़े खिलाड़ी विशालकाय रॉकेट बना रहे हैं, तो स्काईरूट छोटे रॉकेट क्यों बना रहा है?

इसके पीछे स्काईरूट की एक बेहद समझदारी भरी रणनीति है। वे छोटे सैटेलाइट्स (Small Satellites) के बाज़ार को टारगेट कर रहे हैं। आज के समय में सैटेलाइट्स किसी स्कूल बस जितने बड़े नहीं होते; अब बहुत से सैटेलाइट्स एक माइक्रोवेव या शू-बॉक्स (जूते के डिब्बे) के आकार के होते हैं। इनका इस्तेमाल मौसम का हाल जानने, खेती की मैपिंग करने और इंटरनेट पहुँचाने जैसे कामों के लिए किया जाता है।

फिलहाल, अगर किसी छोटी कंपनी को अपना छोटा सैटेलाइट लॉन्च करना हो, तो उसे किसी बड़े रॉकेट में बची हुई जगह (Rideshare) का इंतज़ार करना पड़ता है। अगर मुख्य बड़ा सैटेलाइट लेट हुआ, तो छोटा सैटेलाइट भी अटक जाता है।

स्काईरूट अंतरिक्ष की दुनिया का 'Uber' बनना चाहता है। उनके विक्रम सीरीज के रॉकेट (Vikram I, II, और III) इसी तरह डिज़ाइन किए गए हैं ताकि छोटे सैटेलाइट्स को बेहद कम खर्च में और तुरंत लॉन्च किया जा सके। वे कुछ ही दिनों में रॉकेट को असेंबल करके लॉन्च के लिए तैयार कर सकते हैं।

सीक्रेट रेसिपी: 3D प्रिंटिंग और कार्बन फाइबर

एक युवा स्टार्टअप इतनी जल्दी और कम खर्च में रॉकेट कैसे बना लेता है? इसका जवाब है—मैन्युफैक्चरिंग के पुराने तरीकों को छोड़कर नई तकनीक अपनाना।

स्काईरूट बड़े पैमाने पर 3D प्रिंटिंग तकनीक का इस्तेमाल करता है। उन्होंने अपने कई रॉकेट इंजनों (जैसे रमन और धवन इंजन) के हिस्सों को पूरी तरह 3D प्रिंट किया है। पुराने ज़माने में जहां सैकड़ों छोटे कल-पुर्जों को हाथ से वेल्डिंग करके जोड़ने में महीनों लग जाते थे, स्काईरूट उसे कुछ ही दिनों में प्रिंट करके तैयार कर लेता है।

इसके अलावा, इनके रॉकेट की बॉडी को बेहद हल्के लेकिन स्टील से भी मजबूत कार्बन कंपोजिट (Carbon Fiber) से बनाया जाता है। इससे रॉकेट का वजन बहुत कम हो जाता है, जिससे वह कम ईंधन में अंतरिक्ष की यात्रा तय कर सकता है।

आगे का रास्ता क्या है?

स्काईरूट सिर्फ एक कामयाबी पर रुकने वाला नहीं है। उनका अगला बड़ा लक्ष्य है पृथ्वी की कक्षा (Orbit) में लगातार सैटेलाइट्स को स्थापित करना। विक्रम-एस एक सब-ऑर्बिटल फ्लाइट थी (यानी वह अंतरिक्ष तक गई और वापस आ गई), लेकिन उनका आगामी रॉकेट 'विक्रम-1' (Vikram-1) पेलोड को सीधे पृथ्वी की कक्षा में स्थापित करने के लिए तैयार किया जा रहा है।

ग्लोबल इन्वेस्टर्स के भरोसे और भारत सरकार की संस्था IN-SPACe के सहयोग से अब स्काईरूट सिर्फ सपनों के सहारे चलने वाला स्टार्टअप नहीं रह गया है, बल्कि अंतरिक्ष उद्योग का एक बड़ा खिलाड़ी बन चुका है।

आखिरी बात

स्काईरूट एयरोस्पेस की कहानी सिर्फ इंजीनियरिंग की कामयाबी नहीं है, बल्कि यह भारत की बदलती सोच की कहानी है। यह साबित करता है कि भारतीय स्टार्टअप्स सिर्फ ई-कॉमर्स वेबसाइट या फूड डिलीवरी ऐप्स ही नहीं बना सकते, बल्कि वे ऐसी डीप-टेक (Deep-tech) तकनीक भी खड़े कर सकते हैं जो सीधे सितारों को छूती है।

अगली बार जब आप रात में आसमान की तरफ देखें, तो याद रखिएगा कि ऊपर तैर रही किसी तकनीक की शुरुआत शायद हैदराबाद की किसी लैब में हुई हो। और भारत के प्राइवेट स्पेस सेक्टर के लिए, यह तो बस एक प्रारंभ है।

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